अगर आपका बिज़नेस कैश क्रेडिट (CC) पर चलता है, तो आपके साथ यह ज़रूर हुआ होगा: सीमा ₹1 करोड़ है, पर बैंक उसका सिर्फ़ एक हिस्सा ही निकालने देता है। यह अंतर है ड्रॉइंग पावर (DP)। हर बार स्टॉक स्टेटमेंट देने पर यह दोबारा निकाली जाती है, और यही तय करती है कि आप कितनी नकदी इस्तेमाल कर सकते हैं और आपका खाता नियमित रहता है या नहीं।
यह गाइड बताती है कि बैंक DP कैसे निकालते हैं, इसके पीछे कौन-से काग़ज़ होते हैं, और बैलेंस इससे आगे निकल जाए तो क्या होता है। कैश क्रेडिट टर्म लोन और ओवरड्राफ़्ट से कैसे अलग है, इसके लिए हमारी टर्म लोन बनाम कैश क्रेडिट बनाम ओवरड्राफ़्ट गाइड देखें।
मंज़ूर सीमा बनाम ड्रॉइंग पावर
- मंज़ूर सीमा (sanctioned limit) बैंक द्वारा मंज़ूर अधिकतम राशि है, आम तौर पर एक बार में एक साल के लिए।
- ड्रॉइंग पावर आपकी उन चालू संपत्तियों का मार्जिन घटाकर मूल्य है, जिन पर बैंक अभी उधार देगा।
आप दोनों में से जो कम हो उतना निकाल सकते हैं। स्टॉक और प्राप्य राशियाँ ज़्यादा हों तो DP सीमा से ऊपर जा सकती है, और सीमा आपको रोकती है। कमज़ोर महीने में DP सीमा से काफ़ी नीचे आ सकती है, और DP आपको रोकती है।
ड्रॉइंग पावर कैसे निकाली जाती है
चरण 1: स्टॉक, स्टॉक स्टेटमेंट से
बैंक आपके पास मौजूद स्टॉक लेते हैं, आम तौर पर श्रेणी के अनुसार: कच्चा माल, work in progress (WIP), तैयार माल और कभी-कभी stores and spares। आम बातें:
- स्टॉक का मूल्य आम तौर पर लागत या बाज़ार मूल्य, जो भी कम हो उस पर लिया जाता है।
- पुराना, ख़राब या धीमी बिक्री वाला स्टॉक अक्सर बाहर रखा जाता है या उस पर ज़्यादा मार्जिन लगता है।
- अगर आपके sanction में शर्त है, तो बैंक का हित दर्ज करके स्टॉक का बीमा होना चाहिए।
चरण 2: भुगतान किया हुआ स्टॉक पाने के लिए सप्लायरों का बकाया घटाएँ
उधार पर ख़रीदे गए माल का भुगतान अभी नहीं हुआ है। अगर बैंक उस पर उधार दे, तो वह असल में आपके सप्लायर के पैसे को फ़ाइनेंस करेगा। इसलिए ज़्यादातर बैंक भुगतान किया हुआ स्टॉक (paid stock) निकालने के लिए स्टॉक में से माल के लिए सप्लायरों का बकाया (sundry creditors for goods) घटाते हैं। कुछ sanctions में यह ज़रूरी नहीं होता, जैसे जहाँ ख़रीद letter of credit से होती है।
चरण 3: स्टॉक मार्जिन लगाएँ
मार्जिन स्टॉक के मूल्य का वह हिस्सा है जो आप ख़ुद लगाते हैं। नियामक का तय कोई एक मार्जिन नहीं है: हर बैंक इसे अपनी नीति और आपके sanction letter में तय करता है। स्टॉक पर 25% मार्जिन आम है, और उदाहरण के लिए HDFC Bank बताता है कि वह डीलरों को स्टॉक और बुक डेट पर कम से कम 25% मार्जिन के साथ फ़ंड देता है। WIP और धीमी बिक्री वाले स्टॉक पर अक्सर ज़्यादा मार्जिन होता है, और कुछ बैंक WIP को बिल्कुल फ़ाइनेंस नहीं करते।
चरण 4: उम्र की सीमा के साथ बुक डेट
प्राप्य राशियाँ तभी गिनी जाती हैं जब वे आपके sanction letter के cut-off से कम पुरानी हों। 90 दिन आम है, पर 60, 120 या 180 दिन भी दिखते हैं। फिर बैंक बुक-डेट मार्जिन लगाते हैं, आम तौर पर 25% से 40%। वे अक्सर इन्हें भी बाहर रखते हैं:
- समूह या सहयोगी कंपनियों से प्राप्य राशियाँ
- पहले से कहीं और discount या factor की गई प्राप्य राशियाँ
- विवादित या संदिग्ध प्राप्य राशियाँ
कुछ बैंक बुक डेट को कुल सीमा के एक तय हिस्से तक सीमित रखते हैं।
चरण 5: जोड़ें और सीमा से तुलना करें
DP यानी स्टॉक DP और बुक-डेट DP का जोड़। DP और मंज़ूर सीमा में से जो कम हो, वह आपके लिए उपलब्ध राशि है।
एक उदाहरण
एक निर्माता की कैश क्रेडिट सीमा ₹1 करोड़ है। आँकड़े और मार्जिन सिर्फ़ उदाहरण हैं; आपका sanction letter ही अंतिम है। आसानी के लिए सारे स्टॉक पर एक ही 25% मार्जिन लिया गया है।
| मद | राशि |
|---|---|
| कच्चा माल | ₹40 लाख |
| Work in progress | ₹10 लाख |
| तैयार माल | ₹30 लाख |
| कुल स्टॉक | ₹80 लाख |
| घटाएँ: माल के लिए सप्लायरों का बकाया | –₹20 लाख |
| भुगतान किया हुआ स्टॉक | ₹60 लाख |
| घटाएँ: 25% मार्जिन | –₹15 लाख |
| स्टॉक पर DP | ₹45 लाख |
| 90 दिन तक के बुक डेट | ₹50 लाख |
| 90 दिन से पुराने बुक डेट (गिने नहीं जाते) | ₹10 लाख |
| घटाएँ: योग्य बुक डेट पर 40% मार्जिन | –₹20 लाख |
| बुक डेट पर DP | ₹30 लाख |
| ड्रॉइंग पावर | ₹75 लाख |
₹1 करोड़ की सीमा होने पर भी यह बिज़नेस इस महीने सिर्फ़ ₹75 लाख निकाल सकता है। अगर आज उसका बैलेंस ₹82 लाख है, तो वह DP से ₹7 लाख ऊपर है। खाता मंज़ूर सीमा के काफ़ी अंदर होने पर भी यह अतिरिक्त राशि अनियमित (irregular) है।
देखिए कि आँकड़ा किससे बदला: ₹20 लाख का बिना चुकाया सप्लायर बकाया और ₹10 लाख की पुरानी प्राप्य राशियाँ। स्टॉक बढ़ाने से ज़्यादा तेज़ी से DP तब बढ़ती है जब सप्लायरों को समय पर भुगतान हो और धीमे भुगतान करने वाले ख़रीदारों से वसूली हो। अगर इनमें से कुछ ख़रीदार देर से भुगतान करने वाली कंपनियाँ हैं, तो रजिस्टर्ड सूक्ष्म या लघु सप्लायर MSMED Act के तहत ब्याज माँग सकता है; कैसे, यह हमारी उद्यम रजिस्ट्रेशन और MSME लोन के फ़ायदे गाइड बताती है।
हमारा ड्रॉइंग पावर कैलकुलेटर यही चरण हर स्टॉक श्रेणी के लिए अलग मार्जिन, देनदारों के cut-off के चुनाव और आपका स्टेटमेंट कितना पुराना है, इसकी जाँच के साथ चलाता है।
स्टॉक स्टेटमेंट: मासिक, सही और ताज़ा
- आवृत्ति। ज़्यादातर sanction letters तय तारीख़ तक मासिक स्टॉक और बुक-डेट स्टेटमेंट माँगते हैं। बड़े उधारकर्ता सीमा की समीक्षा के हिस्से के रूप में तिमाही जानकारी भी दे सकते हैं।
- उम्र। RBI के asset-classification निर्देशों के अनुसार DP के लिए बैंक जिन स्टॉक स्टेटमेंट पर भरोसा करता है, वे तीन महीने से पुराने नहीं होने चाहिए। इससे पुराने स्टेटमेंट से निकाली गई DP पर आधारित बकाया राशि अनियमित मानी जाती है।
- मेल। स्टेटमेंट आपके खातों, GST रिटर्न और ऑडिट किए गए खातों से मेल खाना चाहिए। आपके बताए स्टॉक और बैलेंस शीट के स्टॉक में बड़ा अंतर नवीनीकरण के समय DP घटने का आम कारण है।
स्टॉक ऑडिट
आप जो बताते हैं, बैंक उसकी जाँच करते हैं। RBI के अनुसार बैंकों की Board नीति में बाहरी स्टॉक ऑडिटरों की नियुक्ति शामिल होनी चाहिए, और ₹5 करोड़ और उससे ज़्यादा के NPA खातों के लिए सालाना स्टॉक ऑडिट ज़रूरी है। Standard खातों के लिए सीमा और आवृत्ति हर बैंक ख़ुद तय करता है।
एक प्रकाशित उदाहरण है Tamilnad Mercantile Bank की Stock Audit Policy 2025-26, जो उन ₹3 करोड़ और उससे ज़्यादा की वर्किंग कैपिटल सीमाओं पर साल में एक बार लागू होती है जहाँ प्राथमिक सिक्योरिटी स्टॉक या बुक डेट है। ऑडिटर जाँचता है कि असल स्टॉक स्टेटमेंट से मेल खाता है या नहीं, स्टॉक का भुगतान हुआ है या नहीं, और देनदारों की उम्र क्या है। अगर ऑडिट में DP में कमी मिलती है, तो बैंक उधारकर्ता को सूचना देकर DP घटा देता है, और उधारकर्ता ऑडिट में सहयोग न करे तो आगे की निकासी रोकी जा सकती है।
ड्रॉइंग पावर से ऊपर जाने पर क्या होता है
DP से ऊपर की राशि पहले दिन से ही अनियमित है। यह कितने समय तक रहती है, इससे तय होता है कि आगे क्या होगा।
| स्थिति | RBI के नियम क्या कहते हैं |
|---|---|
| सीमा और DP में से कम वाली राशि से बैलेंस लगातार 30 दिन से ज़्यादा और 60 दिन तक ऊपर | खाता SMA-1 (special mention account) |
| वही, 60 दिन से ज़्यादा और 90 दिन तक | खाता SMA-2 |
| बैलेंस सीमा या DP से लगातार 90 दिन ऊपर, या 90 दिन तक कोई जमा नहीं, या जमा राशि डेबिट किए गए ब्याज जितनी भी नहीं | खाता out of order, और out of order CC या OD खाता NPA के रूप में वर्गीकृत हो सकता है |
| नियत तारीख़ से 180 दिन के अंदर सीमाओं की समीक्षा या नवीनीकरण न हो | खाता NPA के रूप में वर्गीकृत हो सकता है |
₹5 करोड़ और उससे ज़्यादा के कुल exposure वाले उधारकर्ताओं के लिए बैंक हर महीने SMA स्थिति RBI के केंद्रीय क्रेडिट डेटाबेस (CRILC) को भेजते हैं। खाता NPA बनने से पहले ही SMA का इतिहास नवीनीकरण, सीमा बढ़ोतरी और नए लोन को मुश्किल बना देता है। लेंडर जिन दूसरे ख़तरे के संकेतों को देखते हैं, वे हमारी लोन आवेदन क्यों रिजेक्ट होते हैं गाइड में हैं।
आपके लोन दस्तावेज़ों में बताए अनुसार, sanction की अहम शर्तें तोड़ने पर बैंक penal charges भी ले सकते हैं। RBI के 2023 के नियमों के तहत ये घोषित शुल्क होने चाहिए, आपकी दर में जोड़ा गया अतिरिक्त ब्याज नहीं।
ड्रॉइंग पावर को ठीक कैसे रखें
- हर महीने स्टेटमेंट समय पर दें, और उसे अपने खातों व GST डेटा से मेल खाता रखें।
- देनदारों की उम्र पर नज़र रखें। प्राप्य राशियाँ cut-off पार करने से पहले वसूली करें; एक बड़ा बकायेदार ख़रीदार लाखों की DP ख़त्म कर सकता है।
- सप्लायरों का बकाया संभालें। बढ़ता बिना चुकाया बकाया भुगतान किया हुआ स्टॉक और DP घटाता है।
- DP से ऊपर जाने पर बैलेंस जल्दी घटाएँ या अपडेटेड स्टेटमेंट दें। अतिरिक्त राशि को 30 दिन से आगे न जाने दें।
- समय पर नवीनीकरण कराएँ। समीक्षा की तारीख़ से काफ़ी पहले ऑडिट किए गए वित्तीय विवरण, प्रोजेक्शन और स्टॉक डेटा भेजें।
- ज़रूरत के हिसाब से सुविधा चुनें। मशीनरी या लंबी अवधि की संपत्तियों के लिए कैश क्रेडिट इस्तेमाल न करें। अगर टर्म लोन चाहिए, तो बैंक कैसे जाँचते हैं कि आप उसे चुका पाएँगे, यह हमारी DSCR और लेंडर क्या चाहते हैं गाइड दिखाती है।
- अगर आपका टर्नओवर बढ़ा है और DP बार-बार सीमा से ऊपर जाती है, तो सीमा बढ़ाने की माँग करें।
Biz Corp Solutions कैसे मदद करता है
हम MSME, ट्रेडरों, निर्माताओं और ठेकेदारों को उनकी वर्किंग कैपिटल का आकार तय करने, स्टॉक और देनदारों के साफ़ डेटा के साथ नवीनीकरण और सीमा बढ़ोतरी के प्रस्ताव तैयार करने, और कैश क्रेडिट व दूसरी सुविधाओं के लिए उपयुक्त बैंकों और NBFC से संपर्क करने में मदद करते हैं। सीमाएँ, मार्जिन और शर्तें लेंडर तय करते हैं। हमारी वर्किंग कैपिटल और इन्वेंटरी फ़ंडिंग सेवाएँ देखें।
यह लेख 21 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध RBI निर्देशों और प्रकाशित बैंक नीतियों पर आधारित है। मार्जिन, cut-off और ऑडिट के नियम बैंक के हिसाब से बदलते हैं; आपका sanction letter ही अंतिम है।
